श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  3.27.28-29h 
यो देवांश्च मनुष्यांश्च सर्पांश्चैकरथोऽजयत्॥ २८॥
तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते।
 
 
अनुवाद
एक ही रथ के द्वारा देवताओं, मनुष्यों और नागों को जीतने वाले अर्जुन को वनवास का कष्ट सहते देखकर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता? ॥28 1/2॥
 
Why does your anger not increase when you see Arjuna, who conquered gods, men and serpents with the help of a single chariot, suffering the pain of exile? ॥28 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)