श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.27.17 
सत्कृतानि सहस्राणि सर्वकामै: पुरा गृहे।
सर्वकामै: सुविहितैर्यदपूजयथा द्विजान्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
पहले आपके राजमहल में हजारों (सुनहरे) पात्र रहते थे, जो सदैव सब प्रकार के सुस्वादु खाद्य पदार्थों से भरे रहते थे। इन्हीं पात्रों से आप ब्राह्मणों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करते थे और प्रतिदिन उनका सत्कार करते थे॥ 17॥
 
Earlier, in your royal palace there were thousands of (golden) vessels which were always filled with all kinds of eatables of choice. With these vessels you used to fulfill all the desires of the Brahmins and honour them daily.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)