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mahabharat 3.27.13: हे भारत! मैं जो पहले तुम्हें चंदन से लिपटा हुआ और सूर्य के समान तेजस्वी देखता था, अब तुम्हें कीचड़ और मैल से सना हुआ देखकर आसक्ति के कारण दुःखी हो रहा हूँ॥ 13॥   |   mahabharat अध्याय 3.27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.27.13 
या त्वाहं चन्दनादिग्धमपश्यं सूर्यवर्चसम्।
सा त्वां पङ्कमलादिग्धं दृष्ट्वा मुह्यामि भारत॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! मैं जो पहले तुम्हें चंदन से लिपटा हुआ और सूर्य के समान तेजस्वी देखता था, अब तुम्हें कीचड़ और मैल से सना हुआ देखकर आसक्ति के कारण दुःखी हो रहा हूँ॥ 13॥
 
O Bharata! I, who earlier used to see you smeared with sandalwood and resplendent like the Sun, am now feeling sad due to my attachment to see you soiled with mud and filth.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)