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mahabharat 3.269.4: अब शीघ्र ही आश्रम को लौट जाओ। हमें विलम्ब नहीं करना चाहिए; क्योंकि मेरा मन व्याकुल है और चिंता से जल रहा है, और बुद्धि की विवेकशक्ति को ढक रहा है। और मेरे शरीर में स्थित यह प्राण (आत्मा) भयभीत है और पीड़ा से छटपटा रहा है॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.269: पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयिकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 269: पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयिकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.269.4 
क्षिप्रं निवर्तध्वमलं विलम्बै-
र्मनो हि मे दूयति दह्यते च।
बुद्धिं समाच्छाद्य च मे समन्यु-
रुद्‍धूयते प्राणपति: शरीरे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अब शीघ्र ही आश्रम को लौट जाओ। हमें विलम्ब नहीं करना चाहिए; क्योंकि मेरा मन व्याकुल है और चिंता से जल रहा है, और बुद्धि की विवेकशक्ति को ढक रहा है। और मेरे शरीर में स्थित यह प्राण (आत्मा) भयभीत है और पीड़ा से छटपटा रहा है॥4॥
 
‘Now return to the hermitage quickly. We must not delay; because my mind is troubled and burning with worry, covering the discernment power of the intellect. And this master of life (soul) in my body is terrified and is writhing in pain.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)