प्रचुक्रुशुश्चाप्यथ सिन्धुराजं
वृकोदरश्चैव धनंजयश्च।
यमौ च राजा च महाधनुर्धरा-
स्ततो दिश: सम्मुमुहु: परेषाम्॥ २८॥
अनुवाद
तब भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव और राजा युधिष्ठिर - ये सभी महाधनुर्धर सिन्धुराज जयद्रथ को ललकारने लगे। उस समय शत्रु सैनिक इतने भयभीत हो गए कि उनकी दिशा-ज्ञान भी नष्ट हो गया॥28॥
Then Bhimasena, Arjun, Nakula, Sahadeva and King Yudhishthira - all these great archers started challenging Sindhuraj Jayadratha. At that time the enemy soldiers were so frightened that they lost even their senses of directions.॥28॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि पार्थागमने एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें पार्थागमनविषयक दो सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६९॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)