श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 269: पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयिकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.269.24 
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा प्रययुर्हि शीघ्रं
तान्येव वर्त्मान्यनुवर्तमाना:।
मुहुर्मुहुर्व्यालवदुच्छ्वसन्तो
ज्यां विक्षिपन्तश्च महाधनुर्भ्य:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: 'हे जनमेजय!' ऐसा कहकर समस्त पाण्डव अपने विशाल धनुषों की डोरी खींचते हुए तथा बार-बार सर्पों के समान फुंफकारते हुए उन्हीं मार्गों पर बड़ी तेजी से आगे बढ़े।
 
Vaishmpayana says: 'O Janamejaya! Having said this, all the Pandavas proceeded forward with great speed on the same paths, pulling the string of their huge bows and hissing like snakes again and again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)