श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 269: पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयिकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.269.22 
मा व: प्रियाया: सुनसं सुलोचनं
चन्द्रप्रभाच्छं वदनं प्रसन्नम्।
स्पृश्याच्छुभं कश्चिदकृत्यकारी
श्वा वै पुरोडाशमिवाध्वरस्थम्।
एतानि वर्त्मान्यनुयात शीघ्रं
मा व: काल: क्षिप्रमिहात्यगाद् वै॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'ऐसा हो सकता है कि चन्द्रमा की किरणों के समान सुन्दर नेत्रों और मनोहर नासिका से सुशोभित तुम्हारे प्रियतम का स्वच्छ, प्रसन्न और पवित्र मुख किसी पापी मनुष्य द्वारा उसी प्रकार स्पर्श कर लिया जाए, जैसे कुत्ता यज्ञ के पुरोडाश को चाट जाता है। अतः यथाशीघ्र इन मार्गों से शत्रु का पीछा करो। तुम्हारा अमूल्य समय यहाँ व्यर्थ न नष्ट हो।'॥ 22॥
 
‘It may happen that the clean, happy and pure face of your beloved, adorned with beautiful eyes and charming nose, like the rays of the moon, is touched by some sinful person, just like a dog licks the purodash of a sacrificial fire. Therefore, as soon as possible, pursue the enemy through these routes. Your precious time should not be wasted here.'॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)