Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.268.4-5: मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस क्षत्रियों के समूह में तुम्हारा कोई भी ऐसा शुभचिंतक बंधु नहीं है, जो तुम्हारा हाथ पकड़कर आज तुम्हें नरक के गहरे गड्ढे में गिरने से बचा सके। हे! जैसे कोई मूर्ख मनुष्य हिमालय की घाटी में विचरण करने वाले पर्वत शिखर के समान ऊँचे और मतवाले होकर बहने वाले हाथी को हाथ में डंडा लेकर उसके समूह से भगा देना चाहता है, वैसे ही तुम धर्मराज युधिष्ठिर को परास्त करने का साहस रखते हो॥ 4-5॥ | mahabharat अध्याय 3.268: द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस क्षत्रियों के समूह में तुम्हारा कोई भी ऐसा शुभचिंतक बंधु नहीं है, जो तुम्हारा हाथ पकड़कर आज तुम्हें नरक के गहरे गड्ढे में गिरने से बचा सके। हे! जैसे कोई मूर्ख मनुष्य हिमालय की घाटी में विचरण करने वाले पर्वत शिखर के समान ऊँचे और मतवाले होकर बहने वाले हाथी को हाथ में डंडा लेकर उसके समूह से भगा देना चाहता है, वैसे ही तुम धर्मराज युधिष्ठिर को परास्त करने का साहस रखते हो॥ 4-5॥
‘It seems to me that in this group of Kshatriyas, there is no well-wisher relative of yours who can hold your hand and save you from falling into the deep pit of hell today. Oh! Just as a foolish person wants to drive away the elephant, which is as tall as the mountain peak roaming in the valley of Himalayas and is flowing in a drunken state, from its herd with a stick in his hand, in the same way you have the courage to defeat Dharmaraja Yudhishthira.॥ 4-5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥