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mahabharat 3.268.21: यदि मैंने कभी विचार में भी अपने परम पूज्य पतियों के कर्तव्य का किसी प्रकार उल्लंघन नहीं किया है, तो आज इसी सत्य के बल से मैं देखूँगी कि पाण्डवों ने तुम्हें जीत लिया है, अपने अधीन कर लिया है और तुम्हें भूमि पर घसीट रहे हैं ॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 3.268: द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 268: द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.268.21 
यथा वाहं नातिचरे कथंचित्
पतीन् महार्हान् मनसापि जातु।
तेनाद्य सत्येन वशीकृतं त्वां
द्रष्टास्मि पार्थै: परिकृष्यमाणम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
यदि मैंने कभी विचार में भी अपने परम पूज्य पतियों के कर्तव्य का किसी प्रकार उल्लंघन नहीं किया है, तो आज इसी सत्य के बल से मैं देखूँगी कि पाण्डवों ने तुम्हें जीत लिया है, अपने अधीन कर लिया है और तुम्हें भूमि पर घसीट रहे हैं ॥ 21॥
 
If I have never even in my thoughts violated the duties of my most revered husbands in any way, then today, by the power of this truth, I will see that the Pandavas have conquered you, have subdued you and are dragging you on the ground. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)