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mahabharat 3.268.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जयद्रथ के वचन सुनकर द्रौपदी का सुन्दर मुख क्रोध से लाल हो गया, आँखें लाल हो गईं, भौंहें टेढ़ी हो गईं और वह सौवीर (योद्धाओं के राजा) जयद्रथ को डाँटकर पुनः इस प्रकार कहने लगी -॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.268: द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 268: द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.268.1 
वैशम्पायन उवाच
सरोषरागोपहतेन वल्गुना
सरागनेत्रेण नतोन्नतभ्रुवा।
मुखेन विस्फूर्य सुवीरराष्ट्रपं
ततोऽब्रवीत् तं द्रुपदात्मजा पुन:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जयद्रथ के वचन सुनकर द्रौपदी का सुन्दर मुख क्रोध से लाल हो गया, आँखें लाल हो गईं, भौंहें टेढ़ी हो गईं और वह सौवीर (योद्धाओं के राजा) जयद्रथ को डाँटकर पुनः इस प्रकार कहने लगी -॥1॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing Jaydratha's words, Draupadi's beautiful face turned red with anger, her eyes turned red, her eyebrows became crooked and she rebuked the Sauviras (king of warriors), Jaydratha, and said again thus -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)