अध्याय 268: द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण
श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जयद्रथ के वचन सुनकर द्रौपदी का सुन्दर मुख क्रोध से लाल हो गया, आँखें लाल हो गईं, भौंहें टेढ़ी हो गईं और वह सौवीर (योद्धाओं के राजा) जयद्रथ को डाँटकर पुनः इस प्रकार कहने लगी -॥1॥
श्लोक 2: अरे मूर्ख! मेरे पति पाण्डव बड़े यशस्वी हैं, सदा अपने धर्म का पालन करते हैं, यक्षों और राक्षसों के समूह में भी युद्ध करने में समर्थ हैं, देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी और महायोद्धा हैं। उनका क्रोध तीक्ष्ण विष वाले सर्पों के समान भयंकर है। उनके मान के विरुद्ध ऐसी ओछी बातें कहते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?॥ 2॥
श्लोक 3: सज्जन लोग किसी भी प्रतिष्ठित, तपस्वी और विद्वान पुरुष के प्रति, चाहे वह वनवासी हो या गृहस्थ, अनुचित बात नहीं कहते। जयद्रथ! मनुष्यों में केवल तुम्हारे जैसे कुत्ते ही इस प्रकार भौंकते हैं॥3॥
श्लोक 4-5: मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस क्षत्रियों के समूह में तुम्हारा कोई भी ऐसा शुभचिंतक बंधु नहीं है, जो तुम्हारा हाथ पकड़कर आज तुम्हें नरक के गहरे गड्ढे में गिरने से बचा सके। हे! जैसे कोई मूर्ख मनुष्य हिमालय की घाटी में विचरण करने वाले पर्वत शिखर के समान ऊँचे और मतवाले होकर बहने वाले हाथी को हाथ में डंडा लेकर उसके समूह से भगा देना चाहता है, वैसे ही तुम धर्मराज युधिष्ठिर को परास्त करने का साहस रखते हो॥ 4-5॥
श्लोक 6: तुम मूर्खतापूर्वक अपनी मांद में सो रहे महाबली सिंह को लात मार रहे हो और उसके चेहरे के बाल नोच रहे हो। जिस क्षण तुम भीमसेन को क्रोध में भरा हुआ देखोगे, उसी क्षण तुम भाग जाओगे।
श्लोक 7: यदि तुम क्रोध में भरे हुए भयंकर योद्धा अर्जुन के साथ युद्ध करना चाहते हो, तो समझ लो कि तुम एक सोये हुए भयंकर सिंह को लात मार रहे हो, जो पर्वत की गुफाओं में उत्पन्न हुआ है, वहीं पला-बढ़ा है तथा अत्यंत भयंकर एवं पराक्रमी है।
श्लोक 8: हे पुरुषरत्न! यदि आप दोनों छोटे पाण्डवों के साथ युद्ध करना चाहते हैं, तो यह स्वीकार करना होगा कि आप नशे में धुत होकर अपने पैरों से दो काले सर्पों की पूंछों को कुचल रहे हैं, जिनमें से प्रत्येक की दो जीभें हैं और जिनके मुख में तीक्ष्ण विष है।
श्लोक 9: अरे मूर्ख! जैसे बाँस, केला और सरकंडे अपने विनाश के लिए ही उगते हैं, अपनी समृद्धि के लिए नहीं। और जैसे केकड़ा अपनी मृत्यु के लिए ही गर्भ धारण करता है, वैसे ही तू मुझ पाण्डवों द्वारा सदैव सुरक्षित रहने वाली द्रौपदी का अपहरण केवल अपनी मृत्यु के लिए ही करना चाहता है।॥9॥
श्लोक 10: जयद्रथ बोला- कृष्ण! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पति पाण्डवराज कैसे हैं। ये सब बातें मुझे मालूम हैं। किन्तु इस समय तुम हमें इस भय से नहीं डरा सकतीं॥10॥
श्लोक 11: हे द्रुपदपुत्री, कृष्ण! हम सब उन कुलीन कुलों में उत्पन्न हुई हैं जो सत्रह गुणों से संपन्न हैं। इसके अतिरिक्त, हम छः गुणों में पाण्डवों से भी बढ़कर हैं, इसलिए हम उन्हें अपने से हीन समझती हैं।
श्लोक 12: कृष्ण! तुम बड़ी-बड़ी बातें करके हमें नहीं रोक सकते। अब तुम्हारे पास दो ही उपाय हैं - या तो सीधे चलकर मेरे हाथी या रथ पर सवार हो जाओ; या पाण्डवों की पराजय के पश्चात करुण स्वर में विलाप करके सौवीर राजा जयद्रथ से दया की याचना करो॥12॥
श्लोक 13: द्रौपदी बोलीं - "यद्यपि मैं महान् बल और पराक्रम से संपन्न हूँ, फिर भी सौवीर राजा जयद्रथ की दृष्टि में मैं दुर्बल प्रतीत होती हूँ। मुझे भगवान पर विश्वास है; मैं बलपूर्वक जयद्रथ से कभी भी दयापूर्ण वचन नहीं बोल सकूँगी।" ॥13॥
श्लोक 14: जिस द्रौपदी को भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन रथ पर बैठकर खोजेंगे, उसका हरण देवराज इन्द्र भी नहीं कर सकते, फिर अन्य कोई दीन-हीन मनुष्य क्या कर सकता है?॥14॥
श्लोक 15: जब शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाले, किरीटधारी अर्जुन शत्रुओं का मनोबल नष्ट करते हुए मेरे लिए रथ पर बैठकर तुम्हारी सेना में प्रवेश करेंगे, तब जैसे ग्रीष्म ऋतु में अग्नि घास और तिनकों को जला देती है, उसी प्रकार मैं तुम्हें और तुम्हारी सेना को भस्म कर दूँगा॥ 15॥
श्लोक 16: भगवान श्रीकृष्ण, अंधक और वृष्णि वंश के वीरों तथा केकयवंश के सभी महाधनुर्धर राजकुमारों सहित मेरे रक्षक हैं। ये सभी राजकुमार हर्ष और उत्साह से भरकर मेरी खोज में निकलेंगे॥16॥
श्लोक 17: अर्जुन के गाण्डीव धनुष की प्रत्यंचा से छूटे हुए अत्यन्त वेगवान बाण मेघों के समान गर्जना करते हैं। वे भयानक बाण अर्जुन के हाथ में लगकर अत्यन्त भयंकर शब्द करते हैं। 17॥
श्लोक 18: जब तुम गाण्डीव धनुष से छूटे हुए बाणों के विशाल समूह को टिड्डियों के समान उड़ते हुए देखोगे और जब अद्भुत पराक्रम से विभूषित वीर अर्जुन को देखोगे, तब तुम्हें अपने इस दुष्कर्म का स्मरण होगा और तुम अपनी बुद्धि को धिक्कारोगे॥18॥
श्लोक 19: जब गाण्डीव धनुष धारण करने वाला अर्जुन शंखध्वनि के साथ दस्तानों की ध्वनि करता हुआ बार-बार बाण उठाकर तुम्हारी छाती पर प्रहार करेगा, उस समय तुम्हारे मन की क्या स्थिति होगी? (इस पर भी विचार करो)॥19॥
श्लोक 20: अरे, दुष्ट! जब भीमसेन हाथ में गदा लेकर दौड़ेंगे और मद्रिणी के पुत्र नकुल और सहदेव क्रोध का विष उगलते हुए सब ओर से तुम्हारी सेना पर आक्रमण करेंगे, तब उन्हें देखकर तुम बहुत देर तक शोक की अग्नि में जलते रहोगे।
श्लोक 21: यदि मैंने कभी विचार में भी अपने परम पूज्य पतियों के कर्तव्य का किसी प्रकार उल्लंघन नहीं किया है, तो आज इसी सत्य के बल से मैं देखूँगी कि पाण्डवों ने तुम्हें जीत लिया है, अपने अधीन कर लिया है और तुम्हें भूमि पर घसीट रहे हैं ॥ 21॥
श्लोक 22: मैं जानती हूँ कि तुम क्रूर हो, इसलिए मुझे बलपूर्वक घसीटकर ले जाओगे। लेकिन मैं इससे विचलित नहीं होऊँगी। मैं शीघ्र ही अपने पतियों, कुरुवंश के वीर पांडवों से मिलूँगी और उनके साथ इस काम्यक वन में रहने आऊँगी।
श्लोक 23: वैशम्पायन कहते हैं, 'जनमेजय! उस समय जयद्रथ के साथी आश्रम में घुस आए और द्रौपदी को पकड़ना चाहा। यह देखकर द्रौपदी ने बड़ी-बड़ी आँखों से उन्हें डाँटकर कहा, 'खबरदार, कोई मेरे शरीर को छूने न पाए।' तब भयभीत होकर उसने अपने पुरोहित धौम्य मुनि को बुलाया।
श्लोक 24: तभी जयद्रथ ने आगे बढ़कर द्रौपदी के शॉल का छोर पकड़ लिया, किन्तु द्रौपदी ने उसे जोर से धक्का दे दिया। धक्का देते ही पापी जयद्रथ का शरीर जड़ से कटे वृक्ष की भाँति भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 25: फिर वह बड़े बल से उठा और राजकुमारी द्रौपदी को पकड़ लिया। तब द्रौपदी बार-बार गहरी साँसें लेती हुई ऋषि धौम्य के चरणों में झुकी, लेकिन जयद्रथ द्वारा खींचे जाने के कारण उसे विवश होकर उसके रथ पर बैठना पड़ा।
श्लोक 26: तब धौम्य ने कहा, "जयद्रथ! क्षत्रियों के प्राचीन धर्म को तो देखो। महाबली पाण्डवों को परास्त किये बिना तुम्हें इसे लेने का कोई अधिकार नहीं है।"
श्लोक 27: इसमें कोई संदेह नहीं कि जब तुम धर्मराज जैसे वीर पाण्डवों का सामना करोगे, तब तुम्हें इस पापकर्म का बुरा फल भोगना पड़ेगा ॥27॥
श्लोक 28: वैशम्पायन कहते हैं: 'हे जनमेजय!' ऐसा कहकर धौम्य ऋषि पैदल सेना में सवार होकर उस सुप्रसिद्ध राजकुमारी द्रौपदी के पीछे-पीछे चलने लगे, जिसका हरण किया जा रहा था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥