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mahabharat 3.267.13-15: जयद्रथ बोला, "आइए, आइए, मेरे रथ पर बैठकर शाश्वत सुख भोगिए। अब पांडवों के पास धन नहीं रहा। उनका राज्य छीन लिया गया है। वे दुखी और निराश हो गए हैं। अब आपके लिए इन वनवासी कुंतीपुत्रों का अनुसरण करना उचित नहीं है। विद्वान स्त्रियाँ दरिद्र पति की पूजा नहीं करतीं। जब तक लक्ष्मी पति के साथ रहती हैं, तब तक उनके साथ रहना चाहिए। जब ​​उनका धन नष्ट हो जाए, तो उनके पास कभी नहीं रहना चाहिए।" 13-15।   |   mahabharat अध्याय 3.267: जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.267.13-15 
जयद्रथ उवाच
एहि मे रथमारोह सुखमाप्नुहि केवलम्॥ १३॥
गतश्रीकांश्च्युतान् राज्यात् कृपणान् गतचेतस:।
अरण्यवासिन: पार्थान्नानुरोद्‍धुं त्वमर्हसि॥ १४॥
नैव प्राज्ञा गतश्रीकं भर्तारमुपयुञ्जते।
युञ्जानमनुयुञ्जीत न श्रिय: संक्षये वसेत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जयद्रथ बोला, "आइए, आइए, मेरे रथ पर बैठकर शाश्वत सुख भोगिए। अब पांडवों के पास धन नहीं रहा। उनका राज्य छीन लिया गया है। वे दुखी और निराश हो गए हैं। अब आपके लिए इन वनवासी कुंतीपुत्रों का अनुसरण करना उचित नहीं है। विद्वान स्त्रियाँ दरिद्र पति की पूजा नहीं करतीं। जब तक लक्ष्मी पति के साथ रहती हैं, तब तक उनके साथ रहना चाहिए। जब ​​उनका धन नष्ट हो जाए, तो उनके पास कभी नहीं रहना चाहिए।" 13-15।
 
Jaydrath said, "Come, come, sit on my chariot and enjoy eternal happiness. Now the Pandavas have no wealth. Their kingdom has been snatched away. They have become miserable and disheartened. Now it is not appropriate for you to follow these forest dwelling sons of Kunti. Learned women do not worship a poor husband. As long as Lakshmi is with the husband, one should stay with him. When his wealth is destroyed, one should never stay there." 13-15.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)