शिवदेश के राजकुमार कोटिकास्य से ऐसा कहकर चन्द्रमुख द्रौपदी अपनी सुन्दर कुटिया में चली गईं। यह सोचकर कि 'ये लोग हमारे अतिथि हैं', उन्हें देखकर उन्हें श्रद्धा हो गई। अतः वह प्रसन्नतापूर्वक उनके आतिथ्य की व्यवस्था करने लगीं॥9॥
Having said this to Prince Kotikasya of Shivdesh, the moon-faced Draupadi went inside her beautiful hut. Thinking that 'these people are our guests', she had faith in them. So she happily started making arrangements for their hospitality.॥9॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि द्रौपदीवाक्ये षट्षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक दो सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६६॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)