श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 266: द्रौपदीका कोटिकास्यको उत्तर  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.266.8 
सम्मानिता यास्यथ तैर्यथेष्टं
विमुच्य वाहानवरोहयध्वम्।
प्रियातिथिर्धर्मसुतो महात्मा
प्रीतो भविष्यत्यभिवीक्ष्य युष्मान्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
अब तुम सब अपनी-अपनी सवारियों से उतर जाओ, अपने घोड़े खोल लो और विश्राम करो। मेरे पतियों का आतिथ्य स्वीकार करके अपने इच्छित देश को जाओ। महापुरुष धर्मपुत्र युधिष्ठिर अतिथि-प्रेमी हैं। वे तुम सबको देखकर बहुत प्रसन्न होंगे।॥8॥
 
‘Now you all get down from your rides, untie your horses and take rest. After accepting the hospitality of my husbands, go to your desired country. The great soul Dharmaputra Yudhishthira is a great lover of guests. He will be very happy to see you all.’॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)