बुद्धॺाभिजानामि नरेन्द्रपुत्र
न मादृशी त्वामभिभाष्टुमर्हति।
न त्वेह वक्तास्ति तवेह वाक्य-
मन्यो नरो वाप्यथवापि नारी॥ २॥
अनुवाद
‘राजकुमार! मैंने विचार करके यह समझ लिया है कि मुझ जैसी पतिपरायणा स्त्री को आपके समान किसी अन्य पुरुष से बात नहीं करनी चाहिए; परंतु यहाँ कोई दूसरा पुरुष या स्त्री नहीं है जो आपके प्रश्न का उत्तर दे सके॥ 2॥
‘Prince! I have thought over it and understand that a woman like me who is devoted to her husband should not talk to another man like you; but there is no other man or woman here who can answer your question.॥ 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)