श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 263:  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  3.263.48-49 
इति तेऽभिहितं राजन् यत् पृष्टोऽहमिह त्वया॥ ४८॥
एवंविधान्यलीकानि धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभि:।
पाण्डवेषु वनस्थेषु प्रयुक्तानि वृथाभवन्॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जो कुछ तुमने मुझसे पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें यहाँ कह दिया है। इस प्रकार धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्रों ने वनवासी पाण्डवों के साथ अनेक बार छल-कपट किया, परन्तु वह सब व्यर्थ हुआ ॥48-49॥
 
O King! I have told you everything that you asked me here. In this way the wicked sons of Dhritarashtra used deceit and fraud several times on the forest dwelling Pandavas, but all of it was in vain. ॥ 48-49॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने त्रिषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दुर्वासाकी कथाविषयक

दो सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६३॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)