श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 263:  »  श्लोक 32-35
 
 
श्लोक  3.263.32-35 
दुर्वासा उवाच
वृथा पाकेन राजर्षेरपराध: कृतो महान्।
मास्मानधाक्षुर्दृष्ट्वैव पाण्डवा: क्रूरचक्षुषा॥ ३२॥
स्मृत्वानुभावं राजर्षेरम्बरीषस्य धीमत:।
बिभेमि सुतरां विप्रा हरिपादाश्रयाज्जनात्॥ ३३॥
पाण्डवाश्च महात्मान: सर्वे धर्मपरायणा:।
शूराश्च कृतविद्याश्च व्रतिनस्तपसि स्थिता:॥ ३४॥
सदाचाररता नित्यं वासुदेवपरायणा:।
क्रुद्धास्ते निर्दहेयुर्वै तूलराशिमिवानल:।
तत एतानपृष्ट्वैव शिष्या: शीघ्रं पलायत॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
दुर्वासा बोले, "वास्तव में व्यर्थ ही रसोई तैयार करवाकर हमने राजा युधिष्ठिर के प्रति महान अपराध किया है। कहीं ऐसा न हो कि पाण्डव हम पर क्रूर दृष्टि डालें और हमें जलाकर भस्म कर दें। हे ब्राह्मणों! परम बुद्धिमान राजा अम्बरीष के प्रभाव का स्मरण करके मैं उन भक्तों से सदैव भयभीत रहता हूँ, जिन्होंने भगवान हरि के चरणों की शरण ली है। सभी पाण्डव महामनस्वी, धार्मिक, विद्वान, पराक्रमी, व्रती और तपस्वी हैं। वे सदैव सदाचारी हैं और भगवान वासुदेव को ही अपना परम आश्रय मानते हैं। यदि पाण्डव क्रोधित हो जाएँ, तो वे हमें उसी प्रकार भस्म कर सकते हैं, जैसे अग्नि रुई के ढेर को जला देती है। अतः हे शिष्यों! पाण्डवों से पूछे बिना ही तुरंत भाग जाओ।"
 
Durvasa said, "Indeed, by getting the kitchen prepared in vain, we have committed a great crime against King Yudhishthira. It may happen that the Pandavas look at us with cruel eyes and burn us to ashes. O Brahmins! Remembering the influence of the most intelligent King Ambrish, I am always afraid of those devotees who have taken refuge in the feet of Lord Hari. All the Pandavas are great-minded, religious, learned, valiant, fasting and ascetics. They are always virtuous and consider Lord Vasudeva as their ultimate refuge. If the Pandavas get angry, they can burn us to ashes in the same way as fire burns a heap of cotton. Therefore, O disciples! Run away immediately without asking the Pandavas."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)