श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 263:  »  श्लोक 28-31
 
 
श्लोक  3.263.28-31 
ते चावतीर्णा: सलिले कृतवन्तोऽघमर्षणम्॥ २८॥
दृष्ट्वोद्‍गारान् सान्नरसांस्तृप्त्या परमया युता:।
उत्तीर्य सलिलात् तस्माद् दृष्टवन्त: परस्परम्॥ २९॥
दुर्वाससमभिप्रेक्ष्य ते सर्वे मुनयोऽब्रुवन्।
राज्ञा हि कारयित्वान्नं वयं स्नातुं समागता:॥ ३०॥
आकण्ठतृप्ता विप्रर्षे किंस्विद् भुञ्जामहे वयम्।
वृथा पाक: कृतोऽस्माभिस्तत्र किं करवामहे॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वे ऋषिगण जल में डूबे हुए अघमर्षण मन्त्र का जप कर रहे थे। सहसा उन्हें पूर्ण तृप्ति का अनुभव हुआ; वे अन्नरस से बार-बार डकार लेने लगे। यह देखकर वे जल से बाहर आ गए और एक-दूसरे की ओर देखने लगे। (सबकी यही दशा थी।) उन सब ऋषियों ने दुर्वासा की ओर देखकर कहा - 'ब्रह्मर्षि! हम लोग राजा युधिष्ठिर को भोजन बनाने का आदेश देकर स्नान करने आए थे, किन्तु इस समय हम इतने तृप्त हो गए हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि हमारा गला अन्न से भर गया है। अब हम कैसे भोजन करेंगे? हमारा बनाया हुआ भोजन व्यर्थ चला जाएगा। उसके लिए हमें क्या करना चाहिए?'॥28-31॥
 
Those sages were chanting the Aghamarshana mantra while immersed in water. Suddenly they felt completely satiated; they started belching repeatedly with food juice. Seeing this, they came out of the water and started looking at each other. (Everyone was in the same state.) All those sages looked at Durvasa and said - 'Brahmarshi! We had come to take bath after ordering King Yudhishthira to prepare food, but at this time we are so satiated that it seems that our throats are full of food. How will we eat now? The food we have prepared will go to waste. What should we do for that?'॥28-31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)