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mahabharat 3.263.17-18: वैशम्पायन कहते हैं - द्रौपदी की इस प्रकार प्रार्थना सुनकर अचिन्त्य परमेश्वर जगन्नाथ, भक्त-प्रेमी भगवान केशव को यह ज्ञात हो गया कि द्रौपदी पर कोई विपत्ति आ पड़ी है। तब वे रुक्मिणी को अपने पास शय्या पर सोता हुआ छोड़कर तुरन्त वहाँ पहुँचे।   |   mahabharat अध्याय 3.263:   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 263:  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  3.263.17-18 
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा देव: कृष्णया भक्तवत्सल:।
द्रौपद्या: संकटं ज्ञात्वा देवदेवो जगत्पति:॥ १७॥
पार्श्वस्थां शयने त्यक्त्वा रुक्मिणीं केशव: प्रभु:।
तत्राजगाम त्वरितो ह्यचिन्त्यगतिरीश्वर:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - द्रौपदी की इस प्रकार प्रार्थना सुनकर अचिन्त्य परमेश्वर जगन्नाथ, भक्त-प्रेमी भगवान केशव को यह ज्ञात हो गया कि द्रौपदी पर कोई विपत्ति आ पड़ी है। तब वे रुक्मिणी को अपने पास शय्या पर सोता हुआ छोड़कर तुरन्त वहाँ पहुँचे।
 
Vaishmpayana says - On hearing Draupadi's prayer in this manner, the inconceivable Supreme Lord Jagannath, the devotee-loving Lord Keshav came to know that some calamity had befallen Draupadi. ​​Then, leaving Rukmini sleeping beside him on the bed, he immediately reached there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)