श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 262: दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.262.28 
वैशम्पायन उवाच
इत्थं ते निकृतिप्रज्ञा राजन् दुर्योधनादय:।
हसन्त: प्रीतमनसो जग्मु: स्वं स्वं निकेतनम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! छल-कपट में निपुण दुर्योधन आदि सभी लोग इस प्रकार हँसते-बोलते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने महलों को चले गए।
 
Vaishmpayana says: O King! Duryodhan and others, who were proficient in the art of deceit and fraud, went to their respective palaces happily, talking and laughing in this manner. 28.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने द्विषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दुर्वासाका उपाख्यानविषयक

दो सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६२॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)