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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 262: दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना
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श्लोक 17
श्लोक
3.262.17
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य महर्षेर्भावितात्मन:।
अमन्यत पुनर्जातमात्मानं स सुयोधन:॥ १७॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! शुद्ध हृदय वाले दुर्वासा मुनि के ये वचन सुनकर दुर्योधन के मन में ऐसा अनुभव हुआ मानो उसका नया जन्म हुआ हो।
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing these words of the pure-hearted sage Durvasa, Duryodhan felt in his mind as if he had been born anew.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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