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mahabharat 3.261.50: हे पराक्रमी युधिष्ठिर! तेरहवें वर्ष के पश्चात् तुम अपने पूर्वजों का राज्य प्राप्त करोगे, अतः अब तुम्हारी मानसिक चिन्ताएँ दूर हो जानी चाहिए ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.261.50 
पितृपैतामहं राज्यं प्राप्स्यस्यमितविक्रम।
वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं व्येतु ते मानसो ज्वर:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
हे पराक्रमी युधिष्ठिर! तेरहवें वर्ष के पश्चात् तुम अपने पूर्वजों का राज्य प्राप्त करोगे, अतः अब तुम्हारी मानसिक चिन्ताएँ दूर हो जानी चाहिए ॥50॥
 
O mighty Yudhishthira! After your thirteenth year you will inherit the kingdom of your forefathers, so your mental worries should now be over. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)