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mahabharat 3.261.48: हे कुन्तीपुत्र! अतः तुम भी वैभवशाली राज्य से वंचित होकर शोक मत करो; तुम तपस्या द्वारा उसे प्राप्त करोगे ॥48॥   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.261.48 
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय न शोकं कर्तुमर्हसि।
राज्यात् स्फीतात् परिभ्रष्टस्तपसा तदवाप्स्यसि॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! अतः तुम भी वैभवशाली राज्य से वंचित होकर शोक मत करो; तुम तपस्या द्वारा उसे प्राप्त करोगे ॥48॥
 
O son of Kunti! Therefore you too should not grieve for being deprived of a prosperous kingdom; you will attain it by austerity. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)