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mahabharat 3.261.46: उनकी दृष्टि में निन्दा और प्रशंसा समान हो गए। वे मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझने लगे और शुद्ध ज्ञान योग के माध्यम से प्रतिदिन ध्यान करने लगे।   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.261.46 
तुल्यनिन्दास्तुतिर्भूत्वा समलोष्टाश्मकाञ्चन:।
ज्ञानयोगेन शुद्धेन ध्याननित्यो बभूव ह॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
उनकी दृष्टि में निन्दा और प्रशंसा समान हो गए। वे मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझने लगे और शुद्ध ज्ञान योग के माध्यम से प्रतिदिन ध्यान करने लगे।
 
In his eyes, criticism and praise became equal. He started considering lump of clay, stone and gold as equal and started meditating daily through pure knowledge yoga.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)