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mahabharat 3.261.44: जहाँ लोग जाते हैं, वहाँ वे कभी शोक नहीं करते, कभी व्यथित नहीं होते और कभी विचलित नहीं होते। मैं तो उस सनातन धाम का ही अनुसंधान करूँगा।॥44॥   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.261.44 
यत्र गत्वा न शोचन्ति न व्यथन्ति चलन्ति वा।
तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गयिष्यामि केवलम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जहाँ लोग जाते हैं, वहाँ वे कभी शोक नहीं करते, कभी व्यथित नहीं होते और कभी विचलित नहीं होते। मैं तो उस सनातन धाम का ही अनुसंधान करूँगा।॥44॥
 
Where people go they never grieve, never get distressed and never get disturbed. I will only research that everlasting abode.'॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)