Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.261.42: 'देवदूत! आपको नमस्कार। हे पिता! निश्चिंत होकर आइए। स्वर्ग या वहाँ का सुख महान दोषों से भरा है; इसलिए मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है।' 42   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.261.42 
देवदूत नमस्तेऽस्तु गच्छ तात यथासुखम्।
महादोषेण मे कार्यं न स्वर्गेण सुखेन वा॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
'देवदूत! आपको नमस्कार। हे पिता! निश्चिंत होकर आइए। स्वर्ग या वहाँ का सुख महान दोषों से भरा है; इसलिए मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है।' 42
 
‘Angel! Greetings to you. Father! Come with peace of mind. Heaven or the happiness there is full of great defects; therefore I do not need it. 42.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)