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mahabharat 3.261.33: मुनि! तथापि वहाँ से भटके हुए प्राणियों का एक और महान गुण भी देखा जाता है, कि वे अपने शुभ कर्मों के प्रभाव से ही मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.261.33 
अयं त्वन्यो गुण: श्रेष्ठश्च्युतानां स्वर्गतो मुने।
शुभानुशययोगेन मनुष्येषूपजायते॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मुनि! तथापि वहाँ से भटके हुए प्राणियों का एक और महान गुण भी देखा जाता है, कि वे अपने शुभ कर्मों के प्रभाव से ही मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं ॥33॥
 
Muni! However, another great quality of the creatures who have gone astray from there is also seen, that due to the influence of their good deeds, they are born as human beings only. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)