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mahabharat 3.261.32: मौद्गल्य! ये भयंकर दोष ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोकों में देखे जाते हैं। स्वर्ग में रहते हुए भी पुण्यात्मा पुरुषों में सहस्रों गुण होते हैं। 32.   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.261.32 
आब्रह्मभवनादेते दोषा मौद्‍गल्य दारुणा:।
नाकलोके सुकृतिनां गुणास्त्वयुतशो नृणाम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
मौद्गल्य! ये भयंकर दोष ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोकों में देखे जाते हैं। स्वर्ग में रहते हुए भी पुण्यात्मा पुरुषों में सहस्रों गुण होते हैं। 32.
 
Maudgalya! These terrible defects are seen in all the worlds up to Brahmaloka. While living in heaven, virtuous men have thousands of virtues. 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)