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mahabharat 3.261.15: स्वर्गवासियों की (दिव्य पुष्पों की) मालाएँ कभी नहीं मुरझातीं। उनसे दिव्य सुगंध निकलती रहती है और वे देखने में भी अत्यंत सुंदर होती हैं। हे ब्रह्मन्! सभी स्वर्गवासी ऐसे विमानों से धन्य हैं॥15॥   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.261.15 
न म्लायन्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमा:।
संयुज्यन्ते विमानैश्च ब्रह्मन्नेवंविधैश्च ते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
स्वर्गवासियों की (दिव्य पुष्पों की) मालाएँ कभी नहीं मुरझातीं। उनसे दिव्य सुगंध निकलती रहती है और वे देखने में भी अत्यंत सुंदर होती हैं। हे ब्रह्मन्! सभी स्वर्गवासी ऐसे विमानों से धन्य हैं॥15॥
 
The garlands (of divine flowers) of the residents of heaven never wither. They keep on emitting divine fragrance and they are also very beautiful to look at. O Brahman! All the residents of heaven are blessed with such planes.॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)