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mahabharat 3.261.12: महर्षि! स्वर्ग ऐसा ही है। अपने पुण्य कर्मों के फलस्वरूप ही उसे प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य अपने पुण्य कर्मों के कारण ही वहाँ निवास कर सकते हैं॥12॥   |   mahabharat अध्याय 3.261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 261: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्‍गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.261.12 
ईदृश: स मुने लोक: स्वकर्मफलहेतुक:।
सुकृतैस्तत्र पुरुषा: सम्भवन्त्यात्मकर्मभि:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
महर्षि! स्वर्ग ऐसा ही है। अपने पुण्य कर्मों के फलस्वरूप ही उसे प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य अपने पुण्य कर्मों के कारण ही वहाँ निवास कर सकते हैं॥12॥
 
Maharshi! Heaven is like this. One can attain it as a result of one's good deeds. Human beings can live there only because of their good deeds.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)