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mahabharat 3.260.9: ईर्ष्यारहित महात्मा मुद्गल जब एक द्रोण चावल से बना हुआ अन्न दान करते थे, तब मुद्गल के अन्य अतिथियों को देखने के फलस्वरूप वह अतिरिक्त अन्न बढ़ जाता था॥9॥   |   mahabharat अध्याय 3.260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.260.9 
व्रीहिद्रोणस्य तद्धॺस्य ददतोऽन्नं महात्मन:।
शिष्टं मात्सर्यहीनस्य वर्धतेऽतिथिदर्शनात्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
ईर्ष्यारहित महात्मा मुद्गल जब एक द्रोण चावल से बना हुआ अन्न दान करते थे, तब मुद्गल के अन्य अतिथियों को देखने के फलस्वरूप वह अतिरिक्त अन्न बढ़ जाता था॥9॥
 
Whenever the great soul Mudgal, who was free from jealousy, used to donate food prepared from one Drona of rice, the surplus food used to increase as a result of Mudgal seeing the other guests.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)