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mahabharat 3.260.4-5: उन्होंने अतिथि सेवा का व्रत ले रखा था। वे बड़े ही एकनिष्ठ और तपस्वी थे और कबूतर का व्यवसाय अपनाकर अपनी आवश्यकतानुसार थोड़ा-सा अन्न एकत्रित करते थे। अपनी स्त्री और पुत्र के साथ रहकर वे पंद्रह दिन में एक द्रोण अन्न को कबूतर की भाँति चुन-चुनकर एकत्रित करते थे और उसी से इष्टकृत नामक यज्ञ करते थे। इस प्रकार उन्हें और उनके परिवार को प्रत्येक पंद्रह दिन में भोजन प्राप्त होता था॥ 4-5॥   |   mahabharat अध्याय 3.260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  3.260.4-5 
अतिथिव्रती क्रियावांश्च कापोतीं वृत्तिमास्थित:।
सत्रमिष्टीकृतं नाम समुपास्ते महातपा:॥ ४॥
सपुत्रदारो हि मुनि: पक्षाहारो बभूव ह।
कपोतवृत्त्या पक्षेण व्रीहिद्रोणमुपार्जयत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने अतिथि सेवा का व्रत ले रखा था। वे बड़े ही एकनिष्ठ और तपस्वी थे और कबूतर का व्यवसाय अपनाकर अपनी आवश्यकतानुसार थोड़ा-सा अन्न एकत्रित करते थे। अपनी स्त्री और पुत्र के साथ रहकर वे पंद्रह दिन में एक द्रोण अन्न को कबूतर की भाँति चुन-चुनकर एकत्रित करते थे और उसी से इष्टकृत नामक यज्ञ करते थे। इस प्रकार उन्हें और उनके परिवार को प्रत्येक पंद्रह दिन में भोजन प्राप्त होता था॥ 4-5॥
 
He had taken a vow to serve guests. He was very dedicated and ascetic and by adopting the profession of a pigeon, he used to collect only a little grain as per his requirement. Living with his wife and son, he used to collect one drona grain in fifteen days by picking it like a pigeon picks grains and with that he used to perform the yajna called Ishtikrit. In this way, he and his family used to get food every fifteen days.॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)