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mahabharat 3.260.22: परन्तु उन्होंने कभी उनके मन में कोई बुराई नहीं देखी। दुर्वासा को महर्षि मुद्गल का मन, जो पवित्र हृदय वाले थे, सदैव पवित्र और स्वच्छ लगता था।   |   mahabharat अध्याय 3.260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.260.22 
न चास्य मनसा कंचिद् विकारं ददृशे मुनि:।
शुद्धसत्त्वस्य शुद्धं स ददृशे निर्मलं मन:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
परन्तु उन्होंने कभी उनके मन में कोई बुराई नहीं देखी। दुर्वासा को महर्षि मुद्गल का मन, जो पवित्र हृदय वाले थे, सदैव पवित्र और स्वच्छ लगता था।
 
But he never saw any evil in his mind. Durvasa always found the mind of Maharishi Mudgal, who had a pure heart, to be pure and clean.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)