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mahabharat 3.260.2: मेरा मानना ​​है कि महान धर्मात्मा पुरुष का जन्म सफल होता है, जिसके कर्मों को ईश्वर संतुष्ट करता है, जो मनुष्यों के धर्म को प्रत्यक्ष रूप से देखता और जानता है। 2॥   |   mahabharat अध्याय 3.260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.260.2 
प्रत्यक्षधर्मा भगवान् यस्य तुष्टो हि कर्मभि:।
सफलं तस्य जन्माहं मन्ये सद्धर्मचारिण:॥ २॥
 
 
अनुवाद
मेरा मानना ​​है कि महान धर्मात्मा पुरुष का जन्म सफल होता है, जिसके कर्मों को ईश्वर संतुष्ट करता है, जो मनुष्यों के धर्म को प्रत्यक्ष रूप से देखता और जानता है। 2॥
 
I believe that the birth of a person of great righteousness is successful, whose deeds are satisfied by God, who directly sees and knows the religion of human beings. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)