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mahabharat 3.260.19: ऋषि निराहार रहकर पुनः अन्न के दाने बीनने लगे। भूख की पीड़ा उनके मन में कोई विक्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकी॥19॥   |   mahabharat अध्याय 3.260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.260.19 
निराहारस्तु स मुनिरुञ्छमार्जयते पुन:।
न चैनं विक्रियां नेतुमशकन्मुद्‍गलं क्षुधा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
ऋषि निराहार रहकर पुनः अन्न के दाने बीनने लगे। भूख की पीड़ा उनके मन में कोई विक्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकी॥19॥
 
The sage remained without food and again started picking grains of food. The pain of hunger was not able to create any disturbance in his mind.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)