श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 260: दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्‍गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्‍गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.260.12 
बिभ्रच्चानियतं वेषमुन्मत्त इव पाण्डव।
विकच: परुषा वाचो व्याहरन् विविधा मुनि:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! दुर्वासा ऋषि पागलों के समान विचित्र वेश धारण किए हुए, सिर मुंडाए हुए तथा बहुत कठोर वचन बोलते हुए आश्रम में आए।
 
O son of Pandu! Sage Durvasa arrived at the hermitage wearing strange attire like a madman, with shaven head and speaking many harsh words.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)