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mahabharat 3.26.22-25: द्वैपायन व्यास, नारद, परशुराम, पृथुश्रवा, इंद्रद्युम्न, भालुकी, कृतचेता, सहस्रपात, कर्णश्रवा, मुंज, लावनाश्व, कश्यप, हारीत, स्थुनकर्ण, अग्निवेश्य, शौनक, कृत्वाक, सुवाक, बृहदश्व, विभावसु, ऊर्ध्वरेता, वृषामित्र, सुहोत्र और होत्रवाहन - ये सभी ब्रह्मर्षि और कठोर व्रतों का पालन करने वाले राजर्षि तथा अन्य अनेक ब्राह्मण अजातशत्रु युधिष्ठिर का उसी प्रकार आदर करते थे, जिस प्रकार महर्षि लोग देवराज इन्द्र का आदर करते थे। 22-25॥   |   mahabharat अध्याय 3.26: दल्भपुत्र बकका युधिष्ठिरको ब्राह्मणोंका महत्त्व बतलाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 26: दल्भपुत्र बकका युधिष्ठिरको ब्राह्मणोंका महत्त्व बतलाना  »  श्लोक 22-25
 
 
श्लोक  3.26.22-25 
द्वैपायनो नारदश्च जामदग्न्य: पृथुश्रवा:।
इन्द्रद्युम्नो भालुकिश्च कृतचेता: सहस्रपात्॥ २२॥
कर्णश्रवाश्च मुञ्जश्च लवणाश्वश्च काश्यप:।
हारीत: स्थूणकर्णश्च अग्निवेश्योऽथ शौनक:॥ २३॥
कृतवाक् च सुवाक् चैव बृहदश्वो विभावसु:।
ऊर्ध्वरेता वृषामित्र: सुहोत्रो होत्रवाहन:॥ २४॥
एते चान्ये च बहवो ब्राह्मणा: संशितव्रता:।
अजातशत्रुमानर्चु: पुरंदरमिवर्षय:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
द्वैपायन व्यास, नारद, परशुराम, पृथुश्रवा, इंद्रद्युम्न, भालुकी, कृतचेता, सहस्रपात, कर्णश्रवा, मुंज, लावनाश्व, कश्यप, हारीत, स्थुनकर्ण, अग्निवेश्य, शौनक, कृत्वाक, सुवाक, बृहदश्व, विभावसु, ऊर्ध्वरेता, वृषामित्र, सुहोत्र और होत्रवाहन - ये सभी ब्रह्मर्षि और कठोर व्रतों का पालन करने वाले राजर्षि तथा अन्य अनेक ब्राह्मण अजातशत्रु युधिष्ठिर का उसी प्रकार आदर करते थे, जिस प्रकार महर्षि लोग देवराज इन्द्र का आदर करते थे। 22-25॥
 
Dvaipayan Vyas, Narada, Parashuram, Prithushrava, Indradyumna, Bhaluki, Kritacheta, Sahasrapat, Karnashrava, Munj, Lavnaashva, Kashyap, Harita, Sthunkarna, Agnivesya, Shaunaka, Kritvaak, Suvaak, Brihadashva, Vibhavasu, Urdhvareta, Vrishamitra, Suhotra and Hotravahana - All these Brahmarishis and Rajarishis and many other Brahmins who followed strict vows respected Ajatashatru Yudhishthira in the same way as the Maharshi people respected Devraj Indra. 22-25॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे षड्‍‍विंशोऽध्याय:॥ २६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वमें अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)