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mahabharat 3.259.33: अधर्म से अर्जित धन से किया गया दान कर्ता को महान भय से नहीं बचा सकता ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.259: युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 259: युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.259.33 
अन्यायात् समुपात्तेन दानधर्मो धनेन य:।
क्रियते न स कर्तारं त्रायते महतो भयात्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
अधर्म से अर्जित धन से किया गया दान कर्ता को महान भय से नहीं बचा सकता ॥33॥
 
Charity performed with money acquired through wrongdoings cannot protect the doer from great fear. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)