श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 259: युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.259.20 
इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपयुज्यते।
तस्माच्छरीरं युञ्जीत तपसा नियमेन च॥ २०॥
 
 
अनुवाद
इस लोक में किए गए कर्मों का फल परलोक में भोगना पड़ता है, अतः मनुष्य को अपने शरीर को तप और नियमों के पालन में लगाना चाहिए॥ 20॥
 
‘The deeds done in this world have to be borne in the next world. Therefore, one should devote his body to penance and following rules.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)