Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.259.17-18: महाराज! सत्य, सरलता, क्रोध का अभाव, देवताओं और अतिथियों को अर्पण करके भोजन करना, आत्मसंयम, आत्मसंयम, दूसरों के दोषों को न देखना, हिंसा न करना, भीतर-बाहर से पवित्रता बनाए रखना तथा समस्त इन्द्रियों को वश में रखना - ये सब पवित्र करने वाले पुण्यात्मा पुरुष के गुण हैं॥ 17-18॥ | mahabharat अध्याय 3.259: युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सत्यमार्जवमक्रोध: संविभागो दम: शम:॥ १७॥
अनसूयाविहिंसा च शौचमिन्द्रियसंयम:।
पावनानि महाराज नराणां पुण्यकर्मणाम्॥ १८॥
अनुवाद
महाराज! सत्य, सरलता, क्रोध का अभाव, देवताओं और अतिथियों को अर्पण करके भोजन करना, आत्मसंयम, आत्मसंयम, दूसरों के दोषों को न देखना, हिंसा न करना, भीतर-बाहर से पवित्रता बनाए रखना तथा समस्त इन्द्रियों को वश में रखना - ये सब पवित्र करने वाले पुण्यात्मा पुरुष के गुण हैं॥ 17-18॥
Maharaj! Truth, simplicity, absence of anger, eating food after offering it to the gods and guests, self-control, self-control, not looking at the faults of others, not committing violence, maintaining purity from inside and outside and keeping all the senses under control - these are the virtues of a pious man who purifies everyone.॥ 17-18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥