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mahabharat 3.259.14-15h: नरश्रेष्ठ! इस संसार में कभी न समाप्त होने वाला सुख किसी को नहीं मिलता। केवल उत्तम बुद्धि वाला ज्ञानी पुरुष ही उत्पत्ति, स्थिति और लय के आधार परमात्मा को जानकर कभी सुखी या दुःखी नहीं होता। 14 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.259: युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 259: युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  3.259.14-15h 
न ह्यनन्तं सुखं कश्चित् प्राप्नोति पुरुषर्षभ।
प्रज्ञावांस्त्वेव पुरुष: संयुक्त: परया धिया॥ १४॥
उदयास्तमनज्ञो हि न हृष्यति न शोचति।
 
 
अनुवाद
नरश्रेष्ठ! इस संसार में कभी न समाप्त होने वाला सुख किसी को नहीं मिलता। केवल उत्तम बुद्धि वाला ज्ञानी पुरुष ही उत्पत्ति, स्थिति और लय के आधार परमात्मा को जानकर कभी सुखी या दुःखी नहीं होता। 14 1/2॥
 
Narshrestha! No one in this world finds happiness that never ends. Only a knowledgeable person with excellent intelligence never feels happy or sad after knowing God who is the basis of origin, state and rhythm. 14 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)