Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.257.28: महाराज! शत्रुओं को कष्ट देने वाला वीर दुर्योधन अपने भाइयों को प्रिय लगने वाला कार्य ही करता था। मन में यह निश्चय करके कि 'धन के केवल दो ही लाभ हैं - दान और भोग', वह इन्हीं कार्यों में धन का उपयोग करता था। | mahabharat अध्याय 3.257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भ्रातॄणां च प्रियं राजन् स चकार परंतप:।
निश्चित्य मनसा वीरो दत्तभुक्तफलं धनम्॥ २८॥
अनुवाद
महाराज! शत्रुओं को कष्ट देने वाला वीर दुर्योधन अपने भाइयों को प्रिय लगने वाला कार्य ही करता था। मन में यह निश्चय करके कि 'धन के केवल दो ही लाभ हैं - दान और भोग', वह इन्हीं कार्यों में धन का उपयोग करता था।
King! The brave Duryodhan who used to torment his enemies, used to do the work that his brothers liked. Having decided in his mind that 'money has only two benefits - charity and enjoyment', he used his money for these only.
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि युधिष्ठिरचिन्तायां सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २५७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें युधिष्ठिरकी चिन्तासे सम्बन्ध
रखनेवाला दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५७॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल २८ १/२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥