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mahabharat 3.257.23-24h: राजन! यह सब सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर व्याकुल हो उठे। वे सोचने लगे, 'कर्ण का कवच अभेद्य है और उसका पराक्रम भी अद्भुत है।' ऐसा मानकर तथा वन में हुए कष्टों का स्मरण करके उन्हें शांति नहीं मिली।   |   mahabharat अध्याय 3.257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  3.257.23-24h 
एतच्छ्रुत्वा धर्मसुत: समुद्विग्नो नराधिप।
अभेद्यकवचं मत्वा कर्णमद्‍भुतविक्रमम्॥ २३॥
अनुस्मरंश्च संक्लेशान्न शान्तिमुपयाति स:।
 
 
अनुवाद
राजन! यह सब सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर व्याकुल हो उठे। वे सोचने लगे, 'कर्ण का कवच अभेद्य है और उसका पराक्रम भी अद्भुत है।' ऐसा मानकर तथा वन में हुए कष्टों का स्मरण करके उन्हें शांति नहीं मिली।
 
King! Hearing all this, Dharmaputra Yudhishthira became agitated. He started thinking, 'Karna's armor is impenetrable and his valour is also amazing.' Believing this and remembering the sufferings in the forest, he could not find peace. 23 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)