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mahabharat 3.257.13-14h: यह कहकर दुर्योधन ने कर्ण को गले लगा लिया और कृतों में श्रेष्ठ राजसूय के विषय में सोचने लगा।   |   mahabharat अध्याय 3.257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  3.257.13-14h 
एवमुक्त्वा महाराज कर्णमाश्लिष्य भारत॥ १३॥
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास कौरव:।
 
 
अनुवाद
यह कहकर दुर्योधन ने कर्ण को गले लगा लिया और कृतों में श्रेष्ठ राजसूय के विषय में सोचने लगा।
 
Saying this, Duryodhana embraced Karna and started thinking about the best of the kratus, Rajasuya.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)