श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 257: दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा,युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.257.1 
वैशम्पायन उवाच
प्रविशन्तं महाराज सूतास्तुष्टुवुरच्युतम्।
जनाश्चापि महेष्वासं तुष्टुवू राजसत्तम॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! हे राजनश्रेष्ठ! नगर में प्रवेश करते समय रथियों और अन्य लोगों ने भी दृढ़ निश्चयी और महान धनुर्धर राजा दुर्योधन की प्रशंसा की॥1॥
 
Vaishmpayana says - Maharaj! O best of kings! When entering the city, the charioteers and other people also praised the king Duryodhan who was of firm resolve and a great archer. ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)