श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 255: कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.255.6 
राजसूयं पाण्डवस्य दृष्ट्वा क्रतुवरं महत्।
मम स्पृहा समुत्पन्ना तां सम्पादय सूतज॥ ६॥
 
 
अनुवाद
सूतनंदन! पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर द्वारा सम्पन्न उस महान राजसूय यज्ञ को देखकर मेरी भी उसे करने की इच्छा हुई है। आप मेरी इस इच्छा को पूर्ण करें। 6॥
 
Sutanandan! 'Seeing that great Rajasuya Yagya performed by Pandu's son Yudhishthira, I too have a desire to perform it. You fulfill this wish. 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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