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श्लोक 3.255.4-5  |
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कर्णेन कर्णं राजाब्रवीत् पुन:।
न किंचिद् दुर्लभं तस्य यस्य त्वं पुरुषर्षभ॥ ४॥
सहायश्चानुरक्तश्च मदर्थं च समुद्यत:।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं वै शृणु यथातथम्॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कर्ण की यह बात सुनकर राजा दुर्योधन ने उससे पुनः कहा - 'हे नरश्रेष्ठ! आप जिसकी सहायता करते हैं और जिससे प्रेम करते हैं, उसके लिए कोई भी कार्य कठिन नहीं है। आप मेरे कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। मेरी एक इच्छा है, जिसे मैं आपसे विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, सुनिए।'॥4-5॥ |
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| Vaishampayana says - Janamejaya! On hearing Karna say this, King Duryodhan again said to him - 'O best of men! Nothing is difficult for the one whom you help and whom you love. You are always ready for my welfare. I have a desire, which I am telling you in detail, listen.'॥ 4-5॥ |
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