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श्लोक 3.255.24-25  |
एवमुक्तास्तु ते सर्वे तथेत्यूचुर्नराधिपम्।
संदिदेश ततो राजा व्यापारस्थान् यथाक्रमम्॥ २४॥
हलस्य करणे चापि व्यादिष्टा: सर्वशिल्पिन:।
यथोक्तं च नृपश्रेष्ठ कृतं सर्वं यथाक्रमम्॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| यह सुनकर सबने 'ऐसा ही हो' कहकर राजा की बात मान ली। तत्पश्चात् राजा दुर्योधन ने कार्य में लगे हुए सभी कारीगरों को एक-एक करके हल बनाने का आदेश दिया। हे राजनश्रेष्ठ! राजा की आज्ञा पाकर सभी कारीगरों ने एक-एक करके कार्य पूर्ण किया। |
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| On hearing this, all of them said 'So be it' and agreed with the king. Thereafter, king Duryodhan ordered all the craftsmen engaged in the work to make the plough one by one. O best king! On receiving the king's order, all the craftsmen completed the work one by one. 24-25. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनयज्ञसमारम्भे पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनयज्ञसमारम्भविषयक
दो सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५५॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं) |
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