श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 255: कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.255.21 
अस्माकं रोचते चैव श्रेयश्च तव भारत।
निर्विघ्नश्च भवत्येष सफला स्यात् स्पृहा तव॥ २१॥
 
 
अनुवाद
‘भारत! यह यज्ञ हमें प्रिय है और यह तुम्हारे लिए कल्याणकारी होगा। यह यज्ञ बिना किसी विघ्न के सम्पन्न होता है; अतः इससे तुम्हारी यज्ञ-संबंधी इच्छा भी पूर्ण होगी।॥ 21॥
 
‘Bharat! We like this yajna and it will be beneficial for you. This yajna is completed without any hindrance; hence your desire regarding yajna will also be fulfilled by this.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)