श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 255: कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  3.255.18-19h 
यज्ञवाटस्य ते भूमि: कृष्यतां तेन भारत।
तत्र यज्ञो नृपश्रेष्ठ प्रभूतान्न: सुसंस्कृत:॥ १८॥
प्रवर्ततां यथान्यायं सर्वतो ह्यनिवारित:।
 
 
अनुवाद
भारत! तुम्हारे यज्ञमंडप की भूमि उसी हल से जोती जानी चाहिए। श्रेष्ठ! उसी जोती हुई भूमि में विधिपूर्वक, उत्तम संस्कारों से युक्त, प्रचुर अन्न-जल से युक्त तथा सबके लिए खुला हुआ यज्ञ आरम्भ करना चाहिए। 18 1/2॥
 
India! The land of your Yagyamandap should be plowed with the same ploughshare. The best! It is in that plowed land that the Yagya should be started in a proper manner, full of good values, with abundant food and drink and open to all. 18 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)